LPG मॉडल क्या है? 1991 में भारत के आर्थिक बदलाव की पूरी कहानी
1991 में भारत ने आर्थिक संकट से उबरने के लिए जो नीतियाँ अपनाईं, वे इतिहास बन गईं। जानिए क्या था LPG मॉडल और इसने कैसे बदली देश की दिशा।
क्या आपको पता है, आज से कई साल पहले जुलाई का महीना भारत के आर्थिक इतिहास में कितना महत्वपूर्ण रहा है? जी हां, हम बात कर रहे हैं जुलाई 1991 की, जब भारत एक बड़े आर्थिक संकट से जूझ रहा था।
उस समय देश के सामने विदेशी मुद्रा भंडार की भारी कमी थी और स्थिति काफी गंभीर थी। ऐसे मुश्किल वक्त में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कई बड़े आर्थिक सुधारों की शुरुआत की।
इन सुधारों को LPG मॉडल के नाम से जाना जाता है – उदारीकरण (Liberalisation), निजीकरण (Privatisation), और वैश्वीकरण (Globalisation)।
उदारीकरण का मतलब था नियमों को आसान बनाना ताकि व्यापार और उद्योग को बढ़ावा मिले।
निजीकरण का लक्ष्य था सरकारी नियंत्रण को कम करके निजी कंपनियों को आगे आने का मौका देना।
और वैश्वीकरण का अर्थ था भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया से जोड़ना ताकि व्यापार और निवेश बढ़ सके।
हालांकि पूरा सुधार बजट 24 जुलाई 1991 को पेश किया गया था। लेकिन इसके लिए महत्वपूर्ण घोषणाएं और नीतिगत बदलाव इसी समय के आसपास शुरू हो गए थे।
यह एक बहुत ही साहसिक कदम था जिसने भारत की अर्थव्यवस्था को हमेशा के लिए बदल दिया। इन सुधारों ने आधुनिक भारत की आर्थिक तरक्की की नींव रखी। जिसकी बदौलत आज हम एक मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में दुनिया में खड़े हैं। यह वाकई एक ऐसा निर्णायक पल था जिसने हमारे देश को एक नई दिशा दी।
1991 के आर्थिक सुधार: क्या था खास?
जुलाई 1991 में, जब भारत एक गंभीर आर्थिक संकट से गुज़र रहा था। तब वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कुछ ऐसे बड़े कदम उठाए जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। इन सुधारों को उदारीकरण (Liberalisation), निजीकरण (Privatisation) और वैश्वीकरण (Globalisation) या संक्षेप में LPG मॉडल कहा जाता है।
1. उदारीकरण (Liberalisation): बंधनों से मुक्ति पहले भारत में 'लाइसेंस राज' हुआ करता था। इसका मतलब था कि कोई भी नया उद्योग शुरू करने या किसी मौजूदा उद्योग का विस्तार करने के लिए सरकार से ढेर सारे लाइसेंस और परमिट लेने पड़ते थे। यह प्रक्रिया बहुत लंबी, जटिल और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली थी। अधिकांश उद्योगों के लिए लाइसेंस लेने की अनिवार्यता खत्म कर दी गई। अब सिर्फ कुछ ही संवेदनशील क्षेत्रों (जैसे शराब, सिगरेट, रक्षा उपकरण) के लिए लाइसेंस की ज़रूरत रह गई। कंपनियों को अपनी उत्पादन क्षमता तय करने और अपने उत्पाद की कीमतें निर्धारित करने में ज़्यादा आज़ादी मिली।आयात और निर्यात के नियमों को आसान बनाया गया। जिससे भारतीय उत्पादकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुंचना और विदेशी उत्पादों का देश में आना आसान हो गया। व्यक्तिगत आय और कॉर्पोरेट करों की दरों को कम किया गया ताकि लोग ज़्यादा निवेश करें और टैक्स चोरी कम हो।
2. निजीकरण (Privatisation): सरकारी से निजी की ओर आज़ादी के बाद भारत ने समाजवाद को अपनाया था जहां सरकार का उद्योगों पर ज़्यादा नियंत्रण था। लेकिन धीरे-धीरे देखा गया कि कई सरकारी कंपनियां घाटे में चल रही थीं और उनकी कार्यक्षमता कम थी।
सरकार ने अपनी कई सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (PSUs) में अपनी हिस्सेदारी निजी क्षेत्र को बेचनी शुरू की। इससे सरकार को राजस्व मिला और इन कंपनियों को बेहतर प्रबंधन और दक्षता के साथ चलाने का अवसर मिला। दूरसंचार, विमानन और बैंकिंग जैसे कई क्षेत्रों को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया गया। इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ी, गुणवत्ता में सुधार आया और उपभोक्ताओं को बेहतर विकल्प मिलने लगे।
3. वैश्वीकरण (Globalisation): दुनिया से जुड़ाव वैश्वीकरण का मतलब था भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं के साथ जोड़ना। इससे भारत के लिए दुनिया के बाज़ार खुल गए और विदेशी कंपनियों के लिए भारत में निवेश करना आसान हो गया। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमाएं बढ़ाई गईं और विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इससे देश में पूंजी आई, नई तकनीकें आईं और रोज़गार के नए अवसर पैदा हुए। विदेशों से आने वाले सामानों पर लगने वाले आयात शुल्क (टैरिफ) को कम किया गया। इससे भारतीय उपभोक्ताओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्पाद कम दामों पर मिलने लगे और घरेलू उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा जिससे उनकी गुणवत्ता में सुधार आया। भारतीय रुपये का अवमूल्यन किया गया। जिससे भारतीय निर्यात विदेशों में सस्ता हो गया और निर्यात को बढ़ावा मिला।
इन सुधारों का क्या असर हुआ?
इन सुधारों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था में एक बड़ा बदलाव आया। भारत की विकास दर तेज़ी से बढ़ी और हम दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन गए। देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा। जिससे भविष्य के आर्थिक संकटों से निपटने में मदद मिली।
आर्थिक समृद्धि के कारण एक बड़ा मध्यम वर्ग सामने आया जिसकी क्रय शक्ति बढ़ी। विदेशी निवेश और प्रतिस्पर्धा के कारण नई तकनीकें भारत आईं। जिससे विभिन्न क्षेत्रों में नवाचार (innovation) बढ़ा। इन सुधारों ने भारत को एक खुली बाज़ार-आधारित अर्थव्यवस्था में बदल दिया और देश को इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार किया। यह सचमुच एक ऐसा निर्णायक मोड़ था जिसने भारत के भविष्य को आकार दिया। इन सुधारों की वजह से ही आज भारत एक तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना है। 1991 से पहले भारत में मोबाइल, कार, विदेशी ब्रांड और निजी नौकरियों की कल्पना भी कठिन थी। लेकिन सुधारों के बाद नए-नए अवसर खुले, देश में उद्योग बढ़े और आम लोगों की ज़िंदगी बेहतर होने लगी।
📚 Reference Books
- लुसेंट सामान्य ज्ञान – डॉ. बिनय कर्ण एवं मनवेन्द्र मुकुल
- एरिहंत सामान्य ज्ञान 2025 – एरिहंत विशेषज्ञ
- मनोरमा ईयरबुक (हिंदी संस्करण) – मलयाला मनोरमा
- भारत 2025 – प्रकाशन विभाग, भारत सरकार
- भारतीय संविधान का परिचय – लक्ष्मीकांत
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जुलाई 1991 सिर्फ़ एक महीना नहीं था, बल्कि एक नई सोच की शुरुआत थी। यह वह समय था जब भारत ने अपने पुराने तरीकों को छोड़कर आगे बढ़ने का फैसला किया। और यही वजह है कि आज भी इस महीने को भारतीय अर्थव्यवस्था के टर्निंग पॉइंट के रूप में याद किया जाता है।
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